जशपुर नगर, द प्राइम न्यूज नेटवर्क। भाजपा के फायर ब्रांड कहे जाने वाले युद्धवीर सिंह जूदेव ने सन 2000 में अपने राजनीतिक केरियर के शुरुआत में ही अपनी आक्रामक शैली का इशारा दे दिया था। उनके व्यक्तित्व का आकर्षण कुछ ऐसा था कि उनके समर्थक,छोटू बाबा के लिए जान देने के लिए तैयार रहते थे। महज 40 साल की अल्प आयु में दुनिया को अलविदा कहने वाले युद्धवीर सिंह ने राजनीति का ककहरा,पिता दिलीप सिंह जूदेव से सीखा था। भाजपा के दिग्गज नेता सौदान सिंह को वे अपना राजनीतिक गुरु माना करते थे। 2018 के विधान सभा चुनाव में भाजपा की करारी हार के बाद,लोकसभा चुनाव में कार्यकर्ताओं के मनोबल को ऊंचा उठा कर,चुनावी मैदान में उतारने की बड़ी चुनोती भाजपा के सामने थी। खासकर रायगढ़ लोकसभा सीट में। यहां,भाजपा के सबसे मजबूत गढ़,जशपुर में भाजपा तीनो विधान सभा सीट हार चुकी थी। इन सीटों में मिलने वाली बढ़त के बूते ही भाजपा,रायगढ़ लोकसभा सीट जीतती आ रही थी। अग्नि परीक्षा की इस घड़ी में युद्धवीर सिंह जूदेव संकटमोचक बन कर आए। पार्टी आलाकमान ने लोकसभा सीट पर युद्धवीर की पहल पर नए चेहरे के रूप में जिला पंचायत जशपुर की तात्कालीन अध्यक्ष श्रीमती गोमती साय को मैदान में उतारा था।

लेकिन,पार्टी की अंदरूनी कलह,गोमती साय की जीत में सबसे बड़ी बाधा बन रही थी।यहां के दो बड़े नेता दिवंगत रोशन अग्रवाल और विजय अग्रवाल के बीच चल रहे घमासान से बड़े नेताओं के होश उड़े हुए थे। पार्टी आगे आते हुए युद्धवीर सिंह जूदेव,रायगढ़ में डट गए। उन्होंने भाजपा के सभी बड़े नेताओं से मिलकर,चुनाव के लिए एकजुट पार्टी को जीत की राह में ले आए। चुनाव प्रचार से लेकर वोट बैंक साधने की सारी रणनीति को उन्होंने अपने हाथों में रखा।

नतीजा,विधान सभा की करारी हार को पीछे छोड़ते हुए श्रीमती गोमती साय ने कांग्रेस के प्रत्याशी लालजीत सिंह राठिया को 66 हजार 27 रिकार्ड मतों से जीत हासिल करने में सफलता प्राप्त की थी।




