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एक गीत जिसने आज़ादी की सांसों को स्वर दिया: ‘वंदे मातरम’ के 150 वर्ष पूरे, जानिए कैसे यह राष्ट्रचेतना की धड़कन बना

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स्टोरी

भारत के स्वतंत्रता संग्राम में कई नारे, गीत और लेखन ऐसे रहे जिन्होंने जनता के भीतर आज़ादी की लौ को प्रज्वलित रखा। इन्हीं में से सबसे प्रभावशाली रचना रही ‘वंदे मातरम’। 7 नवंबर 1875 को बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा लिखी गई यह कविता सिर्फ शब्दों का संयोजन नहीं, बल्कि मातृभूमि के लिए समर्पण और बलिदान की भावनाओं का सजीव रूप थी। 2025 में इस अमर गीत को रचे 150 वर्ष पूरे हो रहे हैं, लेकिन इसकी गूंज आज भी देश की आत्मा में उसी तरह उतरती है, जैसे स्वतंत्रता आंदोलन के दौर में उतरती थी।

रचना और पहली बार प्रकाशन

‘वंदे मातरम’ सबसे पहले बंगदर्शन पत्रिका में प्रकाशित हुआ और बाद में बंकिम चंद्र के प्रसिद्ध उपन्यास ‘आनंदमठ’ में शामिल किया गया। उपन्यास में संन्यासियों के संघर्ष और मातृभूमि के प्रति उनकी तपस्या को इस गीत के माध्यम से व्यक्त किया गया था। शब्दों में देश एक माँ है— ऐसी भावनात्मक और सांस्कृतिक पहचान दी गई, जिसे हर भारतीय ने दिल से स्वीकार किया।

कांग्रेस अधिवेशन से उभरी राष्ट्र की आवाज

1896 में कोलकाता में हुए कांग्रेस अधिवेशन के दौरान रवींद्रनाथ टैगोर ने इसे पहली बार सभा में स्वरबद्ध करके प्रस्तुत किया। इस क्षण ने ‘वंदे मातरम’ को जन-आंदोलन का गीत बना दिया। इसके बाद 1905 में बंगाल विभाजन के विरोध में उठी स्वदेशी लहर के साथ यह गीत हर रैली, जुलूस और प्रतिरोध का नेतृत्व करता रहा।
“वंदे मातरम” अब नारा नहीं, आंदोलन की धड़कन बन चुका था।

विदेशी धरती पर भी फहरा गौरव

1907 में मैडम भीकाजी कामा ने जर्मनी के स्टटगार्ट में भारत का पहला राष्ट्रीय ध्वज फहराया, जिस पर ‘वंदे मातरम’ अंकित था। यह उस दौर में भारतीय राष्ट्रवाद की वैश्विक घोषणा थी।

जब इस गीत को गाना बना ‘जुर्म’

ब्रिटिश शासन ने इस गीत के प्रभाव से भयभीत होकर कई जगहों पर इसके गायन पर प्रतिबंध लगाए।

बंगाल के रंगपुर में इसे गाने पर छात्रों पर जुर्माना लगाया गया।

महाराष्ट्र के धुलिया में सभा में गीत का उच्चारण करने पर लाठीचार्ज तक हुआ।

लेकिन जितना दमन बढ़ा, जनता में यह गीत उतना ही गहरा उतरता चला गया।

शब्दों में संघर्ष की चेतना

कपालकुंडला, दुर्गेशनंदिनी जैसे साहित्य के लिए पहचाने जाने वाले बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने इस गीत के माध्यम से उस समय की जनता को यह संदेश दिया —
स्वतंत्रता किसी उपहार से नहीं, संघर्ष से प्राप्त होगी।

स्वतंत्रता सेनानियों का अंतिम स्वर

संग्राम के कठिन दिनों में क्रांतिकारी जेल जाते समय, आंदोलनकारियों की रैलियों में, और यहां तक कि फांसी के फंदे पर चढ़ते हुए भी यही नारा गूंजता था —
वंदे मातरम!

राष्ट्रीय गीत का दर्जा

24 जनवरी 1950 को संविधान सभा ने इसे भारत का राष्ट्रीय गीत घोषित किया। यह स्पष्ट किया गया कि यह गीत भारतभूमि को समर्पित है, किसी धार्मिक स्वरूप को नहीं।

आज के भारत में वंदे मातरम

150 वर्षों के बाद भी यह गीत भारतीयों के दिलों में गौरव, एकता और मातृभक्ति की वही ज्वाला जगाता है। स्कूलों में, राष्ट्रीय पर्वों में, खेल के मैदानों में, और हर उस पल में जब देश अपने होने पर गर्व महसूस करता है —
तभी आवाज उठती है:
वंदे मातरम।

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Author: The Prime News

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